
दिल्ली की सड़कें घने कोहरे में गायब हो जाती हैं। ऑटो वाले हेडलाइट जलाकर धीरे-धीरे चलते हैं। लोग चाय की दुकानों पर अलाव (Campfire) के पास बैठे हाथ सेंकते हैं। मौसम विभाग की ताज़ा रिपोर्ट कहती है — “ये तो बस शुरुआत है इस बार की सर्दी सामान्य नहीं होगी वजह है La Niña, जो पूरी दुनिया का मौसम बिगाड़ देता है।
La Niña क्या है और कैसे प्रभावित कर सकता है?
लोगों के मन में सवाल है — “ये नया नाम क्यों हर जगह सुनाई दे रहा है?” मौसम वैज्ञानिक बताते हैं कि La Niña दरअसल प्रशांत महासागर का एक नेचुरल इवेंट है। इसमें समुद्र की सतह का पानी सामान्य से ठंडा हो जाता है। नतीजा ये कि हवा और बारिश का पैटर्न पूरी दुनिया में बदल जाता है।
IMD के एक वरिष्ठ वैज्ञानिक कहते हैं, “La Niña का मतलब भारत में ज़्यादा ठंड, लंबी ठंड और कई बार असामान्य मौसम है। इस बार इसका असर पहले से कहीं ज्यादा देखने को मिलेगा।”
उत्तर भारत के राज्यों — दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान पर La Niña का सबसे ज्यादा असर होगा। पारा सामान्य से 3-5 डिग्री नीचे जा सकता है। शीतलहर हफ्तों तक बनी रह सकती है। दिसंबर-जनवरी में न्यूनतम तापमान शून्य के आसपास पहुँच सकता है। 2017 में हुई ठंड को लोग अभी भी याद करते हैं जब कई दिनों तक धूप न निकली। इस बार हालात उससे भी ज़्यादा गंभीर हो सकते हैं।
हिमाचल, उत्तराखंड और कश्मीर जैसे राज्यों में इस बार बर्फबारी लंबे समय तक चलेगी। टूरिस्ट तो खुश होंगे क्योंकि “स्नो-फॉल सीजन” लंबा मिलेगा। लेकिन, पहाड़ी गाँवों में सड़कें हफ्तों तक बंद रह सकती हैं। बिजली और गैस सप्लाई बार-बार बाधित होगी। स्थानीय निवासी बताते हैं कि ऐसी सर्दियों में कई बार गाँव पूरी तरह “कट ऑफ” हो जाते हैं।
किसान की फसलें खतरे में क्यों है?
खेती पर असर गहरा होगा। रबी फसलें जैसे गेहूँ, सरसों और चना को पाले से नुकसान हो सकता है। रात की ठंड से पत्तियाँ जल सकती है। सिंचाई का पैटर्न बिगड़ सकता है क्योंकि मिट्टी ज्यादा देर तक गीली रहेगी।
पंजाब के एक किसान ने कहा, “अगर पाला पड़ गया तो हमारी पूरी सरसों की फसल चौपट हो जाएगी। सरकार को समय रहते सलाह और मदद देनी होगी।”
La Niña के कारण कौन-से संकटों का सामना करना पड़ सकता है?

हीटर और गीज़र के कारण बिजली की मांग बढ़ सकती है। LPG और गैस सिलेंडर की खपत बढ़ेगी। ग्रामीण इलाकों में जहां पहले से बिजली की किल्लत है, वहां परेशानी और बढ़ेगी। पावर सेक्टर के विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि सरकार को अभी से बैकअप प्लान तैयार करना होगा।
फ्लू, निमोनिया और खाँसी-जुकाम के मामले तेज़ी से बढ़ेंगे। बच्चों और बुज़ुर्गों में सर्दी से जुड़ी बीमारियाँ बढ़ेंगी। हृदय और साँस की समस्या वाले मरीजों को ज्यादा खतरा रहेगा। डॉक्टर सलाह दे रहे हैं कि लोग फ्लू वैक्सीन, मास्क और गरम कपड़े अपनाएँ और भीड़भाड़ से बचें।
कोहरे से फ्लाइट्स और ट्रेनें घंटों लेट होंगी। हाइवे पर दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ेगा। पहाड़ी इलाकों में बर्फ से सड़कें बंद होंगी और गाँव अलग-थलग पड़ सकते हैं। पानी की पाइपलाइन तक जम सकती है, जिससे सप्लाई बाधित होगी।
दिल्ली यूनिवर्सिटी के क्लाइमेट एक्सपर्ट कहते हैं, “La Niña अब सिर्फ एक मौसमीय घटना नहीं रह गई है। जलवायु परिवर्तन ने इसे और खतरनाक बना दिया है। अगर सरकार और समाज ने तैयारी नहीं की, तो हालात बिगड़ सकते हैं।”
भारत को क्या करना होगा?
बिजली और गैस सप्लाई को मजबूत करना। बेघर और गरीबों के लिए शेल्टर होम और कंबल उपलब्ध कराना। स्वास्थ्य कैंप लगाना और दवाओं का अतिरिक्त स्टॉक रखना। किसानों को पाले से बचाव की तकनीक समझाना।
गरम कपड़े और हीटिंग का इंतज़ाम पहले से करना। बच्चों और बुज़ुर्गों पर खास ध्यान देना। खानपान में पौष्टिक और गर्म चीज़ें लेना। बेवजह यात्रा से बचना।
निष्कर्ष: वैश्विक स्तर पर La Niña का क्या प्रभाव पड़ेगा?
अमेरिका और यूरोप में ठंड सामान्य से ज्यादा होगी। अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया में भारी बारिश और बाढ़ का खतरा है। एशिया के दूसरे हिस्सों, जैसे जापान और चीन में भी मौसम असामान्य हो सकता है।
2026-27 की सर्दी भारत के लिए एक बड़ा इम्तिहान होगी।
किसानों से लेकर आम आदमी तक और सरकार से लेकर बिजली विभाग तक — सबको तैयारी करनी होगी। La Niña का असर टालना संभव नहीं है, लेकिन जागरूकता और तैयारी से इससे होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है। आने वाले महीनों में देश को ठंड ही नहीं, बल्कि तैयारी, एकजुटता और सहनशक्ति की भी परीक्षा देनी होगी।




