मलयालम की एक मूवी जिसका नाम है सम्भवम् अधियायम उन्नू जिसकी कहानी एक श्रापित जंगल के इर्ध-गिर्द घूमती है। इसके कुछ सीन्स में टाइम ट्रैवल, टाइम लूप, देजा वु (Déjà vu) अनुभव होना और अलग-अलग टाइमलाइन्स में जाने को दिखाया गया है जो अभी के समय में काल्पनिक अथवा वैज्ञानिक (Sci-fi) अवधारणाएँ (Concepts) हैं जिसका वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं है पर अगर इन अवधारणाओं को अपने असल ज़िंदगी यानी वास्तविकता से जोड़कर देखें तो हमे कुछ ऐसी चीजें नज़र आना शुरू होंगी जो हो सकता है सच से काफ़ी दूर हो। इस आर्टिकल में मैं बस अपनी कुछ कल्पनाएँ वास्तविकता से जोड़कर कुछ बताने की कोशिश करना चाहता हूँ जो हो सकता है कि कुछ लोगों को समझ में आय और उन्हें सोचने पर मज़बूर कर दे।
टाइम लूप क्या है और क्या कोई इसमें फंस सकता है?

टाइम लूप का मतलब है समय का एक निश्चित हिस्सा जो बार बार दोहराया जाता है। इस मूवी की कहानी के अनुसार इसमें एक जंगल होता है जहाँ कुछ आदिवासी लोग एक बड़े से कौवे की मूर्ति के सामने पूजा करते थे फिर इस कहानी के अनुसार एक पुर्तगाली शासक जिसका नाम Lord Capreal Antonio था जो चाहता था कि लोग सिर्फ़ मेरी पूजा करें इसीलिए वो जितने भी पूजास्थल थे सबको तोड़ देता था। इसी के कारण जब उसकी नज़र कौवे की मूर्ति पर पड़ी तो उसने तोड़ने की कोशिश की लेकिन बहुत कोशिश करने के बाद भी कौवे की मूर्ति ज़रा भी नहीं टूटी इसी ग़ुस्से और आक्रोश में उसने सभी आदिवासियों उस कौवे की मूर्ति के सामने ही जान से मार देता जिससे बहुत बहुत ख़ून बहा और बहुत आवाज़ें हुई और इसीलिए जंगल श्रापित हो गया तबसे ये श्राप था कि किसी भी इंसान का खून उसस जंगल में गिरा और अत्यधिक आवाज़ हुई तो वो एक टाइम लूप में फस जाएगा और तबतक बाहर नहीं निकल पाएगा जबतक वो उस घटना को होने से रोक नहीं देता जिसके कारण वो टाइमलूप शुरू हुआ था इसीलिए इस मूवी में बार बार एक टाइम लूप में फंसने को दिखाया जाता है जबकि वास्तविकता में ये नहीं हो सकता क्योंकि इसमें टाइम लूप को एक श्राप से जोड़के दिखाया जाता है। इसीलिए टाइम लूप वाली कहानी असल ज़िंदगी में यानी वास्तविकता में अभी भी फिट नहीं बैठ रही जिसके कारण इस टाइम लूप वाली बात को अभी एक कल्पना मान सकते हैं। रही बात टाइमलाइन की तो उसके बारे में भी इस मूवी में दिखाया गया है कि टाइम लूप में फंसे कुछ किरदार एक अलग टाइमलाइन में चले जाते हैं।
टाइम ट्रैवल क्या है और क्या अलग टाइमलाइन में जाना संभव है?

टाइम ट्रैवल यानी समय यात्रा और कुछ नहीं बल्कि अलग-अलग टाइमलाइन्स में आना-जाना है और टाइमलाइन्स यानी समय रेखा मतलब समय के अनुसार किसी घटना या काम को क्रमबद्ध व्यवस्थित करना जिससे ये स्पष्ट हो सके कि कौनसी घटना कब घटी है। काल्पनिक नज़रिए से देखने की कोशिश करें तो एक फ़ैसले से कई घटनाएँ बनती हैं जो समय के साथ बदलती रहती है जो एक टाइमलाइन बनाती है अगर एक फ़ैसला बदल दिया जाये तो सारी घटनाएँ उस टाइमलाइन में बदल जाएगी और आगे होने वाली सभी घटना एक नई टाइमलाइन बनाएगी इसका मतलब अलग-अलग टाइमलाइन्स अलग-अलग फैसलों से बनती है और उन्ही फैसलों पर निर्भर भी करती है, अगर फ़ैसला बदल दिया जाये तो टाइमलाइन भी बदल जाएगी। इस मूवी में एक सीन है जिसमें जो मुख्य किरदार है वो एक टाइम लूप से निकलने के लिए अपने-आप को गोली मारकर मर जाता है जिससे वो एक अलग टाइमलाइन में पहुंच जाता है जिस टाइमलाइन से वो पहले आया होता है लेकिन कुछ चीजें बदल जाती हैं और तभी वो देजा वु अनुभव करता है। अगर इसमें मल्टीवर्स की अवधारणा को जोड़ दिया जाये तो अलग-अलग ब्रह्माण्डों के अलग-अलग पृथ्वीयों में ये टाइमलाइन घटती है।
क्या टाइमलाइन और मल्टीवर्स एक ही सिक्के के दो पहलू हैं?
मेरी अपनी एक थ्योरी या कल्पना के अनुसार मरने के बाद इंसान मल्टीवर्स के किसी एक पृथ्वी में दोबारा जन्म लेता है और वही ज़िन्दगी दोबारा पाता है मगर थोड़े-बहुत बदलाव के साथ। ये थ्योरी कहाँ से आई और क्यों ये थ्योरी सच हो सकती है? इस थ्योरी का जनन भारतीय वैद-पुराण से है। भारतीय वैद-पुराण के अनुसार काकभुसंदी जी रामायण (श्रीरामचरितमानस) के चर्चित पत्र हैं जिनको राम जी और शिव जी का वरदान मिला था जिसके अनुसार वे किसी भी समय में यात्रा कर सकते थे और एक कहानी भी प्रचलित है कि काकभुसंदी जी ने कई बार रामायण और महाभारत होते हुए देखा है और हर बार वो कुछ नया देखते हैं यानी हर रामायण और महाभारत में कुछ-कुछ चीजें अलग होते हैं। एक कहानी हनुमान जी की भी मशहूर है जिसमें वे राम जी की अंगूठी लेन के लिए पाताल लोक जाते है जहाँ उनको पता चलता है कि उनके जैसे कई हनुमान जी अलग अलग ब्राह्मणों से आते हैं राम जी की अंगूठी ढूँढने के लिए। भारतीय वैद-पुराण में ऐसे कई समस्याओं का जवाब पहले से है जिसका सबूत इसने पहले भी दिया है जिसको लागों ने बाद में खोजा और जाना या जो लोगों को अभी पता चल रहा है या जो लग भविष्य में खोजने वाले हैं। यही वजह है की इस थ्योरी में थोड़ी सच्चाई देखें तो हो सकता है मरने के बाद इंसान बार-बार ज़िन्दगी पाता है मगर अलग-अलग टाइमलाइन में। क्योंकि हर पृथ्वी में टाइम अलग-अलग है तो हो सकता है किसी पृथ्वी में समय इस टाइमलाइन से कुछ साल आगे हो, किसी में कुछ साल पीछे, किसी में जीवन का अंत हो रहा हो या किसी में जीवन शुरू हो रहा हो। तो अगर किस पृथ्वी में जीवन शुरू हो रहा है या किसी में जीवन शुरू हो चुका है तो हो सकता है इंसान के मरने के बाद वो किसी अन्य पृथ्वी पर दोबारा जन्म ले अलग टाइमलाइन में मगर उसी समय जिस समय कोई इंसान इस टाइमलाइन में पैदा हुआ हो या हो सकता है अलग समय में ही। और आपकी यादें उस टाइमलाइन वाले व्यक्ति में चली जाती हों जो इंसान ख़ुद होता हो और यही चीज उसको देजा वु या सपने के रूप में नज़र आती हों क्योंकि इंसान की यादें कभी नहीं मिटती वो किसी ना किसी रूप में ज़िंदा रहती है और वही घटना को दोबारा देखके कुछ समय के लिए वो यादें ज़िंदा हो जाती है जिसको इंसान देजा वु या सपने के नाम से जानता है।
देजा वु (Déjà vu) क्या है और क्यों अनुभव होता है?

देजा वु (Déjà vu) एक फ्रांस का एक शब्द है जिसका मतलब होता है आसान भाषा में मतलब होता है कोई ऐसी घटना या वाख्या जो असल में तो नहीं घटी पर ऐसा महसूस होता है की ये चीज पहले भी हो चुका है। इसे हिंदी में पूर्वानुभव या पूर्वाभास भी कहते हैं।
अब सवाल ये आता है की आख़िर इसका अनभाव लोगों को क्यों होता है और क्यों लगभग 80% से ज़्यादा लोगों को इसका अनुभव होता है? स्रोतों की माने तो ये एक मानसिक अथवा मनोवैज्ञानिक अनुभव है और ये इसीलिए होता है क्योंकि हमारा दिमाग़ नए अनुभवों को हमारे पुराने अनुभवों के आधार पर जोड़ने की कोशिश करता है जिसके कारण ही हमें ऐसा महसूस होता है कि ये घटना या वाख्या तो मेरे साथ पहले भी घट चुकी है पर ऐसा होता नहीं। ये बाली श्रोतों का मानना है। लेकिन इस मूवी के अंतिम सीन में मूवी के मुख्य किरदार को ऐसा अनुभव होता है कि ये सारी घटना तो मेरे साथ पहले भी घट चुकी है और मैं दोबारा वही सारी चीजें देख रहा हूँ जो मैं पहले भी देख चुका हूँ पर इसमें कुछ चीजें बदल चुकी हैं बाक़ी सब वही और ये सब उसको एक टाइम लूप में फसने और अलग टाइमलाइन में जाने की वजह से होता है लेकिन उसको उसके पिछले टाइमलाइन में जो कुछ भी हुआ याद नहीं है। तो अगर इस मूवी सीन को वास्तविकता से जोड़कर देखें तो क्या हम एक अलग टाइमलाइन में आने की वजह से अपनी ही पुरानी ज़िंदगी के घटनाओं का अनुभव इस ज़िंदगी में कर रहे हैं जिसे हम सब लोग देजा वु (Déjà vu) कहते हैं।
निष्कर्ष – क्या ये अवधारणाएँ हैं या असल ज़िंदगी से जुड़े सच
विज्ञान की नज़र से देखें तो टाइम लूप, टाइमलाइन और देजा वु जैसी अवधारणाएँ काल्पनिक हैं और इसका असल ज़िन्दगी से कोई संबंध नहीं है। लेकिन सम्भवम् अधियायम उन्नू और हॉलीवुड की कुछ मूवीज़ को देखें तो उनमें कुछ सीन्स ऐसे होते हैं जो काल्पनिक तो होते हैं मगर असल ज़िंदगी से जोड़कर देखने पर ये अवधारणाएँ बहुत हद तक सच की और ले जाती है। इसमें जो टाइमलाइन वाली अवधारणा है इसको थोड़ा और गहराई से सोचने की कोशिश करें तो इंसान एक टाइमलाइन में मरने के बाद एक अलग टाइमलाइन में चला जाता है शायद भूतकाल की टाइमलाइन या मल्टीवर्स के किसी एक पृथ्वी की टाइमलाइन में क्योंकि मरने के बाद क्या होता है इसका कोई वैज्ञानिक सबूत तो नहीं है मगर लोगों के बीच काल्पनिक कहानियाँ बहुत ज़्यादा मशहूर है जैसे मरने के बाद यम दूत आते है, यमराज जी के दर्शन होतें है फिर वे पाप व पुण्य के आधार पर नर्क या स्वर्ग में ले जाते हैं। लेकिन वैज्ञानिक नजरिये से ये सब कहीं-सुनाई कहानियाँ हैं असल में मरने के बाद क्या होता है किसी को नहीं पता और इन कहानियों पर विश्वास करने से अच्छा तो ये सब अवधारणाएँ हैं जिनको गहराई से समझना पर इनमें कुछ सच्चाई नज़र आती हैं।




