इथेनॉल कैसे बनता है? जानिए इसकी पूरी प्रक्रिया, भारत में बढ़ते इस्तेमाल की वजह और इससे जुड़े अहम सवाल

Aman Maurya
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इथेनॉल कैसे बनता है? जानिए इसकी पूरी प्रक्रिया, भारत में बढ़ते इस्तेमाल की वजह और इससे जुड़े अहम सवाल

आजकल पेट्रोल पंप पर अक्सर E20 पेट्रोल या इथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल जैसे शब्द सुनने को मिलते हैं। सरकार लगातार पेट्रोल में इथेनॉल की मात्रा बढ़ाने पर जोर दे रही है ताकि कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम हो और किसानों को भी अतिरिक्त आय का अवसर मिल सके। लेकिन इसके साथ ही लोगों के मन में कई सवाल भी उठते हैं जैसे कि इथेनॉल कैसे बनता है, इसे किन चीजों से तैयार किया जाता है और आखिर इसे पेट्रोल में मिलाने की जरूरत क्यों पड़ती है?

अगर आपने भी कभी ये सवाल सोचे हैं, तो इस लेख में हम आसान भाषा में पूरी प्रक्रिया समझेंगे। साथ ही यह भी जानेंगे कि इथेनॉल उत्पादन को लेकर किन बातों पर बहस होती है और इसके फायदे व चुनौतियां क्या हैं। इथेनॉल क्या होता है और इसका इस्तेमाल क्यों किया जाता है?

इथेनॉल एक प्रकार का एथाइल अल्कोहल (Ethyl Alcohol) है। यह एक रंगहीन, ज्वलनशील (Flammable) और हल्की गंध वाला तरल पदार्थ होता है। इसका उपयोग केवल ईंधन के रूप में ही नहीं, बल्कि दवा उद्योग, सैनिटाइजर, कॉस्मेटिक्स, रसायन उद्योग और कई अन्य उत्पादों के निर्माण में भी किया जाता है।

भारत में पिछले कुछ वर्षों से इथेनॉल की सबसे अधिक चर्चा ईंधन के रूप में हो रही है। सरकार का उद्देश्य पेट्रोल में इथेनॉल मिलाकर पेट्रोलियम उत्पादों के आयात को कम करना और घरेलू स्तर पर तैयार होने वाले जैव ईंधन (Biofuel) को बढ़ावा देना है। इसी वजह से आज कई पेट्रोल पंपों पर E20 यानी 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल उपलब्ध कराया जा रहा है।

इथेनॉल कैसे बनता है? जानिए पूरी प्रक्रिया

इथेनॉल कैसे बनता है, इसका जवाब खेतों से शुरू होकर फैक्ट्री तक पहुंचता है। भारत में इथेनॉल मुख्य रूप से गन्ने से प्राप्त होने वाले मोलासिस (Molasses), गन्ने के रस, मक्का और कुछ परिस्थितियों में चावल जैसे स्टार्च या शर्करा युक्त कच्चे माल से बनाया जाता है।

गन्ने का सीधे इथेनॉल बनाने में हर बार इस्तेमाल नहीं किया जाता। आमतौर पर चीनी बनाने की प्रक्रिया के दौरान जो गाढ़ा भूरा सिरप बचता है, उसे मोलासिस कहा जाता है। इसमें पर्याप्त मात्रा में शर्करा मौजूद होती है, जिससे इथेनॉल तैयार किया जा सकता है। इसके अलावा मक्का और अन्य अनाजों में मौजूद स्टार्च को पहले शर्करा में बदला जाता है, ताकि आगे की प्रक्रिया आसान हो सके।

इसके बाद कच्चे पदार्थ को बड़े टैंकों में पानी के साथ मिलाया जाता है और उसमें यीस्ट (Yeast) डाला जाता है। यही वह चरण है जिसे फर्मेंटेशन (Fermentation) कहा जाता है। यीस्ट शर्करा को तोड़कर इथेनॉल और कार्बन डाइऑक्साइड में बदल देता है। यह प्रक्रिया सामान्यतः दो से तीन दिन तक चलती है।

फर्मेंटेशन पूरा होने के बाद जो मिश्रण तैयार होता है, उसमें इथेनॉल की मात्रा लगभग 8 से 12 प्रतिशत होती है। ईंधन के रूप में उपयोग के लिए यह पर्याप्त नहीं होती, इसलिए अगला चरण शुरू होता है, जिसे डिस्टिलेशन (Distillation) कहा जाता है।

डिस्टिलेशन के दौरान मिश्रण को विशेष कॉलम में गर्म किया जाता है। चूंकि इथेनॉल का क्वथनांक (Boiling Point) पानी से कम होता है, इसलिए वह पहले भाप बनकर ऊपर उठता है। बाद में इस भाप को ठंडा करके दोबारा तरल रूप में बदला जाता है। इस प्रक्रिया से इथेनॉल की शुद्धता लगभग 95 प्रतिशत तक पहुंच जाती है।

हालांकि, पेट्रोल में मिश्रण के लिए इससे भी अधिक शुद्ध इथेनॉल की आवश्यकता होती है। इसलिए अंतिम चरण में डिहाइड्रेशन (Dehydration) किया जाता है, जिसमें बची हुई नमी को विशेष तकनीक से अलग कर दिया जाता है। इसके बाद लगभग 99.5 प्रतिशत शुद्ध एनहाइड्रस इथेनॉल (Anhydrous Ethanol) तैयार होता है, जिसे ईंधन के रूप में पेट्रोल में मिलाया जाता है।

भारत में इथेनॉल का इस्तेमाल क्यों बढ़ रहा है और इससे जुड़े बड़े सवाल

पिछले कुछ वर्षों में भारत ने इथेनॉल उत्पादन और इसके इस्तेमाल को तेजी से बढ़ावा दिया है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि देश अपनी ईंधन जरूरतों का बड़ा हिस्सा अभी भी कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है। ऐसे में पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने से आयात पर निर्भरता कम करने, विदेशी मुद्रा बचाने और किसानों की फसलों के लिए अतिरिक्त बाजार उपलब्ध कराने की कोशिश की जा रही है।

इसी उद्देश्य से सरकार ने E20 ब्लेंडेड पेट्रोल को बढ़ावा देना शुरू किया है। इसका मतलब है कि पेट्रोल में 20 प्रतिशत तक इथेनॉल मिलाया जाता है। सरकार का मानना है कि इससे कार्बन उत्सर्जन कम करने और स्वच्छ ईंधन के उपयोग को बढ़ावा देने में भी मदद मिल सकती है।

हालांकि, इथेनॉल कैसे बनता है और इसका उत्पादन कैसे बढ़ाया जा रहा है, इस पर चर्चा के साथ कुछ सवाल भी उठते हैं। सबसे अधिक बहस पानी की खपत को लेकर होती है। कुछ विशेषज्ञों और कृषि संगठनों का कहना है कि गन्ना जैसी फसलें पहले से ही अधिक पानी मांगती हैं। वहीं इथेनॉल उत्पादन की प्रक्रिया में भी पानी की आवश्यकता होती है। दूसरी ओर सरकार का कहना है कि आधुनिक डिस्टिलरी तकनीकों के कारण प्रति लीटर इथेनॉल में पानी की खपत पहले की तुलना में काफी कम हुई है और कई संयंत्र पानी के पुनर्चक्रण (Recycling) की व्यवस्था भी अपनाते हैं।

एक और मुद्दा खाद्यान्न के उपयोग को लेकर उठता है। हाल के वर्षों में मक्का और कुछ परिस्थितियों में चावल का इस्तेमाल भी इथेनॉल उत्पादन के लिए बढ़ा है। कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि खाद्यान्न का बड़ा हिस्सा ईंधन उद्योग की ओर जाता है, तो भविष्य में इसकी कीमतों पर असर पड़ सकता है। वहीं सरकार का तर्क है कि इथेनॉल उत्पादन के लिए मुख्य रूप से अधिशेष (Surplus) या निर्धारित श्रेणी के अनाज का उपयोग किया जाता है और इससे खाद्य सुरक्षा प्रभावित न हो, इसका ध्यान रखा जाता है।

क्या इथेनॉल से गाड़ियों को नुकसान होता है?

जब भी E20 पेट्रोल की बात होती है, तो वाहन मालिकों के मन में यह सवाल जरूर आता है कि क्या इससे इंजन पर कोई असर पड़ सकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, जिन वाहनों को E20 ईंधन के अनुसार डिजाइन किया गया है, उनमें सामान्य रूप से कोई समस्या नहीं होती। हालांकि पुराने मॉडल की कुछ गाड़ियों में अधिक इथेनॉल मिश्रण के कारण ईंधन प्रणाली के कुछ हिस्सों पर असर पड़ सकता है। यही वजह है कि वाहन निर्माता समय-समय पर यह बताते हैं कि कौन-से मॉडल E20 ईंधन के लिए पूरी तरह अनुकूल (Compatible) हैं।

यानी यह कहना सही नहीं होगा कि E20 हर वाहन के लिए नुकसानदायक है, लेकिन यह जरूर जरूरी है कि वाहन मालिक अपनी गाड़ी के निर्माता द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का पालन करें।

कुल मिलाकर, इथेनॉल कैसे बनता है और इसका इस्तेमाल क्यों बढ़ रहा है, इसे समझना आज पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गया है। एक ओर यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा, किसानों की आय और स्वच्छ ईंधन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, तो दूसरी ओर पानी की उपलब्धता, कृषि संसाधनों और खाद्य सुरक्षा जैसे मुद्दों पर भी लगातार चर्चा हो रही है।

आने वाले वर्षों में इथेनॉल कार्यक्रम की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित उपयोग, आधुनिक तकनीक और खाद्य सुरक्षा के बीच सही तालमेल कैसे बनाया जाता है। यही कारण है कि इथेनॉल केवल एक ईंधन नहीं, बल्कि ऊर्जा, कृषि और पर्यावरण से जुड़ा ऐसा विषय बन चुका है, जिस पर आने वाले समय में भी लगातार चर्चा होती रहेगी.

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